गांव के किनारे बसे छोटे से घर में रामलाल नाम का एक किसान रहता था। उसकी जिंदगी का आधार था उसका छोटा-सा खेत। वह हर सुबह सूरज उगने से पहले उठता, हल उठाता और अपने खेत की ओर निकल जाता। मेहनत उसकी रगों में थी, और फसल उगाना उसका धर्म।
लेकिन इस बार हालात बदले हुए थे। पूरे साल बारिश का नामोनिशान नहीं था। खेत की मिट्टी बंजर हो चुकी थी। जहां कभी हरियाली होती थी, वहां अब धूल उड़ रही थी। गांव के बाकी किसान अपने खेतों को देखकर उदास थे। कुछ ने तो भगवान को कोसना शुरू कर दिया, और कुछ ने खेत छोड़कर शहर जाने का फैसला कर लिया।
रामलाल ने अपने खेत के बीच खड़े होकर सोचा, “क्या सच में भगवान ने मेरा सब कुछ छीन लिया? या फिर यह मेरी मेहनत की परीक्षा है?”
उसने तय किया कि हार मानने का तो सवाल ही नहीं उठता। उसने घर से अपनी बैलगाड़ी निकाली और पास की नदी से पानी भरकर खेत में डालने लगा। अकेला, थका हुआ, लेकिन अपने धर्म पर अडिग।
गांव के लोग उसे देखकर हंसने लगे।
“रामलाल पागल हो गया है,” किसी ने कहा।
“अकेला नदी से पानी भरकर क्या बदल लेगा?” दूसरे ने ताना मारा।
लेकिन रामलाल के चेहरे पर एक मुस्कान थी। उसने जवाब दिया, “मेरा धर्म है मेहनत करना। अगर मैं खुद अपना काम नहीं करूंगा, तो भगवान भी मेरी मदद क्यों करेगा?”
रामलाल ने दिन-रात मेहनत की। बैलगाड़ी में पानी भरना, मिट्टी को सींचना, और अपनी फसल के लिए छोटे-छोटे उपाय करना—यह उसकी दिनचर्या बन गई। धीरे-धीरे, उसकी जमीन नमी पकड़ने लगी। पौधे उगने लगे।
इसी बीच, गांव में कुछ लोगों ने रामलाल की मेहनत को देखा। वे उससे प्रेरित हुए और अपनी बंजर जमीन पर भी काम शुरू किया। रामलाल अकेले नहीं था; उसकी लगन अब पूरे गांव की ताकत बन चुकी थी।
कुछ महीनों बाद, जब बारिश हुई, तो रामलाल का खेत बाकी किसानों से ज्यादा हरा-भरा था। गांव के लोग अब समझ चुके थे कि भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपने धर्म को नहीं छोड़ता।
गांव के मुखिया ने एक सभा बुलाई और कहा, “रामलाल ने हमें सिखाया कि धर्म का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है। धर्म है अपने कर्म को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाना।”
कर्म ही सच्चा धर्म है: मेहनत और कर्म पर विश्वास रखना ही असली पूजा है।
दृढ़ता का महत्व: मुश्किल हालात में भी हिम्मत न हारने वाले ही असली विजेता होते हैं।
सामूहिक प्रेरणा: आपकी मेहनत न केवल आपको, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित कर सकती है।
भगवान उन्हीं की मदद करता है जो खुद की मदद करते हैं: सिर्फ प्रार्थना से कुछ नहीं होता, कर्म जरूरी है।
क्या हम अपने जीवन में रामलाल की तरह मुश्किलों का सामना करते हैं, या फिर हालात से हार मानकर बैठ जाते हैं? धर्म का पालन सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म है अपने कर्तव्यों को निभाना और सही रास्ते पर डटे रहना।
क्या आप अपने जीवन में धर्म के इस असली मतलब को अपनाएंगे?
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